फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीतियों में बदलाव
अमेरिका के फेडरल रिजर्व ने जनवरी 2025 की पहली बैठक में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। इस निर्णय के अंतर्गत ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की गई, जिसे एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है। पिछले जुलाई से यह पहला मौका था जब फेडरल रिजर्व ने अपनी नीतियों में कोई कटौती नहीं की थी। संपूर्ण आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि फेडरल रिजर्व अपने आगे की रणनीतियों को लेकर काफी सतर्क है।
फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल ने स्पष्ट किया है कि यह एक अस्थाई निर्णय है और भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना बनी हुई है। वित्तीय नीति के इस रुख का उद्देश्य पिछले कटौतियों के प्रभावों का आकलन करना है, जो अर्थव्यवस्था पर नया प्रभाव डाल सकती हैं।
आर्थिक विकास और मुद्रास्फीति पर नजर
फ़ेडरल रिजर्व का यह निर्णय आर्थिक विकास और मुद्रास्फीति दोनों के प्रति चिंता को दिखाता है। पॉवेल ने कहा कि समिति उस स्थिति को समायोजित करने के लिए पूरी तरह से तैयार है, जो उनकी आर्थिक लक्ष्यों को पाने में आवश्यक होगी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आगामी फैसले पूरी तरह से आर्थिक डेटा पर निर्भर होंगे।
व्यापार और वित्तीय बाजारों पर प्रभाव
दरें स्थिर रखने का यह कदम संभवतः वित्तीय मार्केट्स और व्यापार समुदाय के बीच उत्सुकता और चिंता का मिश्रण पैदा कर सकता है। क्योंकि फेडरल रिजर्व के फैसले व्यापक प्रभाव डालते हैं, अतः व्यापार और निवेश क्षेत्र में इस निर्णय का गहन विश्लेषण होगा।
तालिका फेडरल फंड्स के दरें और ऐतिहासिक परिवर्तन:
| माह | दर (%) |
|---|---|
| जुलाई 2024 | 4.50 |
| अक्टूबर 2024 | 4.40 |
| जनवरी 2025 | 4.33 |
आगे की दिशा
फेडरल रिजर्व का नीतिगत निर्णय दर्शाता है कि वे सतर्कता के साथ आगे बढ़ रहे हैं। जेरोम पॉवेल और उनकी टीम का आकलन है कि यह परिवर्तनशील जरूर होगा, लेकिन यह उस दिशा में बढ़ेगा जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए सबसे उपयुक्त हो। इस नीति का सीधा असर घरेलू बाजारों पर भी होगा, जिसकी वजह से आगे की दिशा बहुत महत्वपूर्ण होगी।
इस निर्णय से यह जाहिर होता है कि फेडरल रिजर्व अभी भी स्थिति का पर्यवेक्षण कर रहा है और समायोजन पर विचार कर सकता है।
टिप्पणि
Anish Kashyap
ये फेडरल रिजर्व वालों को थोड़ा धैर्य रखना चाहिए ना भाई साहब
जब तक भारत में इन्फ्लेशन नहीं ठीक हो रहा तब तक दरें कम करने की कोशिश मत करो
हमारे यहाँ तो रोज़ सब्ज़ी की कीमत बढ़ रही है और वो अमेरिका में ब्याज दर घटाने की बात कर रहे हैं
मज़ाक है या फिर दुनिया की अर्थव्यवस्था का कोई नक्शा है?
अच्छा होगा अगर वो अपने घर की बात सुधारें और हमारे लिए भी थोड़ा सोचें
हम भी तो दुनिया का हिस्सा हैं ना
बस एक बार इंडिया के डेटा को भी देख लें
कोई ना कोई तो इस बात का जवाब दे दे
हम तो बस एक आम इंसान हैं जो रोज़ की दुकान पर जाता है
और जब दूध की कीमत बढ़ जाती है तो लगता है कि फेडरल रिजर्व ने अपनी बैठक बुला दी है
पर असल में तो बस एक चाय वाले ने अपनी दर बढ़ा दी है
इस तरह के निर्णयों से हमारी जिंदगी नहीं बदलती
लेकिन जब बैंक लोन की EMI बढ़ जाती है तो बहुत बदल जाती है
हमें बस एक समझदारी चाहिए ना
अगर आपको लगता है कि ये निर्णय बिल्कुल सही है तो आप बताइए कि आपकी जेब कैसे भरेगी?
Sanjay Gupta
फेडरल रिजर्व के इस निर्णय को देखकर लगता है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था का दिमाग भी अभी भी 1990 के दशक में है।
क्या आप जानते हैं कि भारत में आज 70% आबादी बैंकिंग सिस्टम से बाहर है?
और फिर भी आप ब्याज दरों की बात कर रहे हैं?
ये सब बकवास है जो सिर्फ वित्तीय एलीट्स के लिए है।
हमारे यहाँ तो गरीब आदमी के लिए ब्याज दर का कोई मतलब नहीं है - उसके पास तो ब्याज देने के लिए पैसा भी नहीं है।
ये सब नीतियाँ बस शेयर बाजार के लिए बनाई जाती हैं - जहाँ अमेरिकी बैंकर अपनी बोनस बनाते हैं।
हमें अपने आप को इन बाहरी निर्णयों से अलग करना होगा।
अगर हम अपनी अर्थव्यवस्था को अपने नियमों से चलाएँगे तो फेडरल रिजर्व का निर्णय हमारे लिए किसी बात का नहीं होगा।
ये निर्णय बिल्कुल भी नया नहीं है - ये तो बस एक और बड़े बैंक की आत्मा की आवाज़ है।
Kunal Mishra
मैंने ये लेख पढ़कर सोचा कि क्या ये लेखक असल में इकोनॉमिक्स का अध्ययन कर चुका है?
या फिर वो सिर्फ एक बुलेटिन को कॉपी-पेस्ट कर रहा है?
फेडरल रिजर्व ने दरें नहीं बढ़ाईं - वो सिर्फ एक छोटी सी कटौती को रोक दिया।
4.33% दर को अभी भी उच्च मानना बेकार है - ये तो अभी भी अत्यधिक है।
क्या आपने देखा कि जब यूरोप में दरें 3% के आसपास हैं तो अमेरिका अभी भी 4.33% पर फंसा हुआ है?
ये नीति बिल्कुल अनुचित है - ये अर्थव्यवस्था को अनावश्यक रूप से धीमा कर रही है।
मुद्रास्फीति ठीक हो रही है, बेरोजगारी नीचे जा रही है - तो फिर ये देरी क्यों?
ये जेरोम पॉवेल बस अपनी बात बचाने के लिए नीति बना रहे हैं।
उनकी टीम में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो असली आंकड़ों को समझता हो।
ये सब एक नाटक है - एक बड़े बैंक का अहंकार।
अगर आप असली आर्थिक विश्लेषण चाहते हैं, तो बस एक बार भारत के आंकड़े देख लीजिए - वहाँ तो ब्याज दरें भी बहुत कम हैं और फिर भी विकास हो रहा है।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था अब एक बूढ़ा बैंकर की यादों का शिकार है।
Poonguntan Cibi J U
मैं इस बात पर रो रहा हूँ कि फेडरल रिजर्व ने ब्याज दर कटौती नहीं की
मेरा भाई लोन पर जी रहा है और अब उसकी EMI बढ़ गई
मैंने उसे कहा कि अभी थोड़ा और इंतज़ार करो
लेकिन वो बोला - तुम्हें तो कोई लोन नहीं है, तुम तो घर पर बैठे हो और ये सब लिख रहे हो
मैंने तो उसे बताया कि ये फेडरल रिजर्व के निर्णय की वजह से है
लेकिन वो बोला - तुम तो इकोनॉमिक्स के बारे में कुछ नहीं जानते
मैं रोया
मैंने अपनी माँ को फोन किया
उसने कहा - बेटा, ये सब बातें तो बड़े लोगों की हैं, हम तो बस रोटी खाते हैं
मैंने तो उसे बताया कि ब्याज दर बढ़ गई है तो रोटी की कीमत भी बढ़ गई है
माँ बोली - तो फिर जाकर कुछ और काम कर ले
मैं रोया
मैंने एक बार फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष की तस्वीर देखी
वो बहुत शांत लग रहे थे
मैंने सोचा - अगर वो भी रोटी खाते तो शायद ये निर्णय अलग होता
मैं अब रोज़ उनकी तस्वीर को देखकर रोता हूँ
क्योंकि मैं जानता हूँ - उनकी आँखों में मेरी माँ की आँखें हैं
और मैं जानता हूँ - वो नहीं जानते कि मैं कौन हूँ
और मैं जानता हूँ - वो कभी नहीं जानेंगे
AnKur SinGh
इस निर्णय को अत्यंत विवेकपूर्ण मानना चाहिए। फेडरल रिजर्व के निर्णय में गहरी आर्थिक विश्लेषणात्मकता दिख रही है - यह एक अत्यंत संतुलित और विचारशील दृष्टिकोण है।
मुद्रास्फीति के नियंत्रण के लिए एक अस्थायी विराम लेना, विशेष रूप से जब अर्थव्यवस्था अभी भी अस्थिर अवस्था में है, वह एक उच्च स्तरीय नीतिगत बुद्धिमत्ता का संकेत है।
हमें यह समझना चाहिए कि ब्याज दरों में त्वरित परिवर्तन अक्सर अप्रत्याशित परिणाम लाते हैं - जैसे कि 2008 के बाद की अवधि में जब बहुत सारे देशों ने तेज़ी से दरें कम कीं और फिर उन्हें फिर से बढ़ाना पड़ा।
फेडरल रिजर्व ने अपने आंकड़ों को बार-बार जांचा है - रोजगार के आंकड़े, उपभोक्ता खर्च, विनिर्माण उत्पादन, और वित्तीय बाजारों की गतिविधि - और फिर भी इस निर्णय को लिया है।
यह एक ऐसा निर्णय है जो अल्पकालिक राजनीतिक दबावों के बजाय दीर्घकालिक स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
अगर यह निर्णय अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए सही है, तो यह वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी एक आदर्श मानक है।
भारत जैसे विकासशील देशों को भी इसी तरह के दृष्टिकोण को अपनाना चाहिए - जहाँ त्वरित निर्णय अक्सर दीर्घकालिक नुकसान का कारण बनते हैं।
यह निर्णय ब्याज दरों के बारे में नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक और जिम्मेदारी के बारे में है।
कोई भी व्यक्ति जो इस निर्णय को आलोचना करता है, वह नीतिगत जटिलताओं को समझने में असमर्थ है।
हमें विश्व के नेताओं को उनके अपने तरीके से काम करने देना चाहिए - जब तक वे जिम्मेदारी से काम कर रहे हों।
इस निर्णय को एक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकेत मानना चाहिए - कि वह अपने आप को बाहरी दबावों से अलग कर रही है।
हमें इसकी प्रशंसा करनी चाहिए, न कि इसकी आलोचना।
यह एक नीतिगत विजय है - और इसका सम्मान करना हमारी जिम्मेदारी है।